पापा...
(मेरे पापा को समर्पित....
ये सिर्फ़ मेरी नही बल्कि हर बेटी की अपने बाबू जी के लिए भावनाएं होंगी .... )

पापा की हूँ प्यारी बेटी, पापा का गुमान हूँ मैं....
पापा की हूँ गोद में खेली, पापा का अभिमान हूँ....
पापा का गुरूर हूँ मैं, हाँ पापा का सम्मान हूँ....
इस सम्मान को कायम रखने को हर पल तैयार हूँ....
चाहे कुछ हो जीवन में ना, पर पापा बिन बेकार हूँ....
अपने बाबा की बेटी मैं, उनका ही तो अरमान हूँ....
जो चाहे मेरे बाबा वो ही है करना धर्म मेरा....
पापा की हर मर्ज़ी पर खरे उतरना कर्म मेरा....
लेकिन फिर भी एक दुःख है....
पापा को छोड़ के जाना होगा....
जाने कैसे हैं रीति- रिवाज़ ये, पर इनको तो निभाना ही होगा...
औरों की नही बाबा की खातिर....
इनको तो निभाना ही पड़ेगा....
कैसे रहूँगी बाबा बिन मैं ?
इनका आँगन छोड़ के ?
क्या होगा जीवन तब मेरा माँ-बाबा को छोड़ के ?
जिनके आँगन में खेली मैं, उनके कंधे चढ़ बड़ी हुई....
लेकिन देखो रीति ये कैसी.... आज उनके लिए ही परायी हुई....
क्या होगा मेरे बिन बाबा ?
कौन बनेगा आपका अभिमान ?
क्यों बनाया बेटी "कृष्ण" ?
क्यों ना पुत्र का जन्म दिया ?
कम से कम बाबा के अरमान तो पूरे कर पाती....
अपने बाबा के ही संग, पूरे जीवन भर रह पाती
पूरे जीवन भर रह पाती....
पूरे जीवन भर रह पाती....
पहली कृति....

(आज तक कभी कुछ नही लिखा कभी....

लेकिन आज कुछ लिखने को दिल कह रहा है...)

सभी को लिखते देख मेरा मन भी किया कुछ लिखने को...

कागज़ कलम तो उठाया पर शब्द नही थे लिखने को .....

बहुत सोचने के बाद भी कोई टॉपिक न मिला लिखने को,

दिल ने कहा रहने दो कुछ लिखने को....

नही ये सब काम तुम्हारा अब रहने भी दो लिखने को...

एक आवाज़ आई अन्दर से,,,,

मन ने कहा...

हार न मानो,,,

अब शुरू भी करो कुछ लिखने को ....

सोच कविता ये लिख डाली पर मिला नही कुछ लिखने को...

अब सोचा क्या हम भी बन पाएँगे एक कवि...

क्या हमे भी मिलेगा कुछ लिखने को???

दिल ने कहा छोड़ो,, अब रहने भी दो लिखने को...

अब रहने भी दो लिखने को...

अब रहने भी दो लिखने को......