आज अचानक बैठे-बैठे वही ख़याल वापस दिमाग में आया,जो रह-रह कर हमेशा मुझे परेशान करता है। मुझे ही क्या, आप सब को भी हमेशा ज़रूर परेशान करता होगाऔर अगर आज तक आपने इस बारे में नही सोचा, तो मेरे इस लेख को पढ़ कर शायद आपका भी ध्यान इस ओर केंद्रित ज़रूर हो जाए। इतना तो विश्वास है । समस्या काफी बड़ी तो नही लेकिन मुझे काफ़ी परेशान करती है । मुझे ही क्या,आप सब को भी कभी न कभी काफी परेशान करती होगी और समस्या ये है कि,क्या हमारी मातृभाषा हिन्दी, अंग्रेज़ी भाषा के आगे अपना वजूद खोती जा रही है? क्या,हमारी भारतीय संस्कृति, पाश्चात्य सभ्यता के आगे धूमिल होती जा रही है? आ गई न समस्या आपके भी ज़हन में? एक उथल- पुथल सी हो जाती है मष्तिष्क में जब ये बात ज़हन में आती है, कि कही सचमुच हम पाश्चात्य सभ्यता के आगे भारतीय सभ्यता को खोते तो नही जा रहे हैं ? हाँ,आज अंग्रेज़ी भाषा अंतर्राष्ट्रीय भाषा है तो उसका प्रभाव ज़रूर पड़ना चाहिए लेकिन डर है कि इस कदर पाश्चात्य सभ्यता हमारी भारतीय सभ्यता पर हावी ना हो जाए कि अपना वजूद ही खो दे और एक दिन पाश्चात्य संस्कृति का बोलबाला अपने देश में न हो जाए। आज के इस बदलते युग ने इस समस्या को और गहरा दिया है जब नेता जी के भाषण भी एकदम अंग्रेज़ी में होते हैं। यहाँ तक कि २६ जनवरी पर प्रधानमंत्री द्वारा दिया जाने वाला भाषण तक भी अधिकतर अंग्रेज़ी में ही होता है। मानती हूँ हर संस्कृति,हर भाषा का सम्मान होना चाहिए। हर भाषा हर जगह बोली जानी चाहिए। परन्तु भारतीय संस्कृति, जिसका अपना एक अलग ही वर्चस्व है । क्या उसे हमें यूँ ही खो देना चाहिए ? नहीं, बिल्कुल नहीं बल्कि ऐसा होगा भी नही । इस विषय पर अगर हम लोगों से बात करें तो पुरानी पीढी से लेकर नई पीढी तक का यही मानना होगा कि निसंदेह अंग्रेज़ी भाषा और पाश्चात्य सभ्यता आज कहीं न कहीं हिन्दी भाषा और भारतीय संस्कृति को प्रभावित अवश्य कर रहे हैं। लेकिन कभी हमारी भाषा,हमारी संस्कृति पर हावी नहीं हो सकते। इनका तो अपना एक अलग ही महत्व है। वो कहते हैं ना कि "जहाँ काम आवै सुई,का करी सके तलवार" यानि अंग्रेज़ी भाषा या पाश्चात्य सभ्यता कितनी ही तलवार क्यों न बने लेकिन हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता हमारी मातृभाषा हिन्दी जैसी सुई की जगह तो काम नही आ सकती न।
( ये तो मेरी सोच है। मेरा आप सब पाठकों से अनुरोध है कि जो भी इस लेख को पढ़े, अपने विचार ज़रूर व्यक्त करे कि क्या सचमुच हमारी संस्कृति, हमारी भाषा आज पाश्चात्य सभ्यता और अंग्रजी भाषा से इतनी प्रभावित हो रही है... )

बहुत सही बोला आपने। लेकिन थोडो सा शब्द विन्यास पर ध्यान दीजिये। और शब्द चयन पर भी। बाकी सब बहुत अच्छा है। तारीफ़ के काबिल
Swati bohot prasangik vishey par likha ha apne....Hindi bhasha kahi na kahi apne hi hindustan me apna varchasva khoti jaa rahi ha...hum angrezi k virudhdh nahi ha par hindi ka aur vistar chahte ha..ummed ha hamari ye yuva pidi jiska hum b ek hissa ha is vishey par gambheerta se sochegi....
lekh me thoda sudhar ho sakta ha...shuruaat kafi ghuma fira k ki ha apne....khair vishey kafi accha chuna ha....badhayi ho...aage aise hi likhti rahiye..shubhkamnaye!
dhanyawaad... aur mai poori koshish karungi.. bhasha chayan me..
स्वाति, मैं खुद भी इस विषय पर सोचता रहा हूं, क्या यह बेहतर न होगा कि भारतीय संस्कृति क्या है इस पर भी विचार साझा किये जाएं...
आपने बहुत उचित कहा है
निसंदेह अंग्रेज़ी भाषा और पाश्चात्य सभ्यता आज कहीं न कहीं हिन्दी भाषा और भारतीय संस्कृति को प्रभावित अवश्य कर रहे हैं। लेकिन कभी हमारी भाषा,हमारी संस्कृति पर हावी नहीं हो सकते।
bilkul sandeepji..
mai apki baat se sahmat hu..
aur sath hi dhanyawad,,apke comment k lie
shukriya kishore ji..
आपके विचार सराहनीय है
एग्रीगेटरों के द्वारा अपने ब्लॉग को हिंदी ब्लॉग जगत परिवार के बीच लाने पर बधाई।
सार्थक लेखन हमेशा सराहना पाता है।
मेरी शुभकामनाएँ
बी एस पाबला
shukriya pablaji..
" aapka swagat hai "
" acche visay ke saath saath lekhan aur sahi alfaz ka dhyan rakhe "
" aapka swagat rahega hamare blog per "
----- eksacchai { AAWAZ }
http://eksacchai.blogspot.com
आपकी बात से में सहमत हूं.
पर आपने एक बात नोट की यहाँ मुंबई में और साऊथ में तो मैंने यह देखा है,
कि फिल्मों और टीवी के कारण हिंदी काफी प्रचलित हुई है .
और लोग़ हिंदी पढने में रूचि भी ले रहे है ..
आपका स्वागत है ,खूब लिखें और बेहतर लिखें ..mk
विचार अच्छे लगे।
हमारे राष्ट्र की भाषा बनी जब शान से हिन्दी।
शुरु से भिन्नता में एकता की जान ये हिन्दी।
क्यों हिन्दी छोड़ बच्चे को सभी अंग्रेजी पढ़ाते हैं?
तो कैसे बन सकेगी राष्ट्र की पहचान ये हिन्दी।।
www.manoramsuman.blogspot.com
bilkul dhyan rakhungi.. mai koi lekhika nahi hu.. lekin apne bhavon ko auro tak pahuchana zarur chahti hu. aur jahan tak ho sakega app sb ki baton ko dhyan me rakhte hue hi mera agla lekh aap tk laane ki koshish karungi. shukriya..
shukriya,,suman ji..
manoj ji bahut bahut dhanyawaad..
bilkul.. aur mera bhi yahi manana hai..
hindi apna vajood nahi kho sakti..
bahut khub. narayan narayan
बहुत बढिया. लिखते रहिये. स्वागत है
बहुत अच्छा लिखा है
हिन्दी चिठ्ठा विश्व में स्वागत है