माँ .....
( माँ....
भगवान हर वक़्त अपने हर एक बच्चे के पास नही रह सकते। इसलिए उन्होंने हमारी देखभाल करने के लिए माँ और बाबा को भेजा ....
उसी माँ को समर्पित ....)

जिसने है हमें जीवन दिया,
जिनके हैं इतने उपकार हम पर....
जो करती हैं इतनी परवाह सिर्फ़ हो सकतीं हैं एक माँ !!!
जो ख़ुद को भूखा रख कर भी बच्चों का पेट भरें....
ममता का गागर हैं जो....
सिर्फ़ हो सकती हैं माँ !!!
चाहे कितनी ही क्यों ना बुराई हो, पर उसका भी उद्धार करें....
दिन - रात कुपूत की भी जो परवाह करें ....
सिर्फ़ हो सकती हैं माँ !!!
सिर्फ़ हो सकती हैं माँ !!!
जिसने इसको पहचाना है, वो ही एक सच्चा बेटा है ....
ऐसे एक बेटे की इच्छा, बस करती है एक माँ....
माँ एक ऐसी देवी हैं जिनसे न बड़ा भगवान....
जिसने माँ का सम्मान किया, बस वो ही बना इंसान....
सिर्फ़ वो ही बना इंसान !!!!
आख़िर जो हमारी जननी हैं....
उनका क्यों न करें सम्मान ???
हर पग पर उन्होंने हमें दिया है ज्ञान....
एक "माँ" ही ऐसी शख्सियत हैं....
इनकी उंगलियाँ पकड़ हमने सीखा है चलना....
फिर उनके आगे शीश झुकाते क्यों शरमाना???
हम बेटियों को लेकिन छोङना पड़े इनका आँगन
जाने क्यों ये रीति बनाई जो छूटे अपना आँगन....
अपना आँगन छोङें, फिर भी माँ का छूटे साथ न....
हाँ, कुछ हो जीवन में चाहे ना, पर माँ की छाव सदा रखना....
पापा...
(मेरे पापा को समर्पित....
ये सिर्फ़ मेरी नही बल्कि हर बेटी की अपने बाबू जी के लिए भावनाएं होंगी .... )

पापा की हूँ प्यारी बेटी, पापा का गुमान हूँ मैं....
पापा की हूँ गोद में खेली, पापा का अभिमान हूँ....
पापा का गुरूर हूँ मैं, हाँ पापा का सम्मान हूँ....
इस सम्मान को कायम रखने को हर पल तैयार हूँ....
चाहे कुछ हो जीवन में ना, पर पापा बिन बेकार हूँ....
अपने बाबा की बेटी मैं, उनका ही तो अरमान हूँ....
जो चाहे मेरे बाबा वो ही है करना धर्म मेरा....
पापा की हर मर्ज़ी पर खरे उतरना कर्म मेरा....
लेकिन फिर भी एक दुःख है....
पापा को छोड़ के जाना होगा....
जाने कैसे हैं रीति- रिवाज़ ये, पर इनको तो निभाना ही होगा...
औरों की नही बाबा की खातिर....
इनको तो निभाना ही पड़ेगा....
कैसे रहूँगी बाबा बिन मैं ?
इनका आँगन छोड़ के ?
क्या होगा जीवन तब मेरा माँ-बाबा को छोड़ के ?
जिनके आँगन में खेली मैं, उनके कंधे चढ़ बड़ी हुई....
लेकिन देखो रीति ये कैसी.... आज उनके लिए ही परायी हुई....
क्या होगा मेरे बिन बाबा ?
कौन बनेगा आपका अभिमान ?
क्यों बनाया बेटी "कृष्ण" ?
क्यों ना पुत्र का जन्म दिया ?
कम से कम बाबा के अरमान तो पूरे कर पाती....
अपने बाबा के ही संग, पूरे जीवन भर रह पाती
पूरे जीवन भर रह पाती....
पूरे जीवन भर रह पाती....
पहली कृति....

(आज तक कभी कुछ नही लिखा कभी....

लेकिन आज कुछ लिखने को दिल कह रहा है...)

सभी को लिखते देख मेरा मन भी किया कुछ लिखने को...

कागज़ कलम तो उठाया पर शब्द नही थे लिखने को .....

बहुत सोचने के बाद भी कोई टॉपिक न मिला लिखने को,

दिल ने कहा रहने दो कुछ लिखने को....

नही ये सब काम तुम्हारा अब रहने भी दो लिखने को...

एक आवाज़ आई अन्दर से,,,,

मन ने कहा...

हार न मानो,,,

अब शुरू भी करो कुछ लिखने को ....

सोच कविता ये लिख डाली पर मिला नही कुछ लिखने को...

अब सोचा क्या हम भी बन पाएँगे एक कवि...

क्या हमे भी मिलेगा कुछ लिखने को???

दिल ने कहा छोड़ो,, अब रहने भी दो लिखने को...

अब रहने भी दो लिखने को...

अब रहने भी दो लिखने को......